श्री युगल छवि ध्यान स्तुति(Shri Yugal Stuti )|
Shri Yugal Stuti | श्रीयुगल सरकार की स्तुति

~ दोहा ~
श्रीप्रिया-वदन छबि-चन्द्र मनौं, प्रीतम-नैंन-चकोर।
प्रेम-सुधा-रस-माधुरी, पान करत निसि-भोर ll1ll
अंगनि की छबि कहा कहौं, मन में रहत विचार।
भूषन भये भूषननि कौं, अति स्वरूप सुकुमार ll2ll
सुरँग माँग मोतिनु सहित, सीस- फूल सुख-मूल।
मोर चन्द्रिका मोहिनी, देखत भूली भूल ll3ll
श्याम-लाल बैंंदी बनी, शोभा बढ़ी अपार।
प्रगट विराजत ससिनु पर, मनौं अनुराग सिंगार ll4ll
कुंडल कल तांटक चल, रहे अधिक झलकाइ।
मनौं धबि के ससि-भानु जुग, धबि-कमलनि मिले आइ ll5ll
नासा बेसर नथ बनी, सोहत चंचल नैंन।
देखत भाँति सुहावनी, मोहे कोटिक मैंन ll6ll
सुन्दर चिबुक कपोल मृदु, अधर सुरंग सुदेश।
मुसिकनि बरसत फूल सुख, कहि न सकत छवि लेश ll7ll
अंगनि भूषन झलकि रहे, अरु अंजन रँग पान।
नवसत-सरवर तें मनौं, निकसे करि स्नान ll8ll
कहि न सकत अंगनि-प्रभा, कुंज-भवन रह्यौ छाय।
मानौं बागे रूप के, पहिरे दुहुँनि बनाय ll9ll
रतनांगद पहुँची बनी, वलया-वलय सुढार।
अँगुरिनु मुँदरीं फबी रही, अरु मेहँदी रँग-सार ll10ll
चन्द्र-हार मुक्तावली, राजति दुलरी-पोति।
पान-पदिक उर जगमगै, प्रतिबिम्बित अँग-जोति ll11ll
मणिमय किंकिनि-जाल छबि, कहौं जोइ सोइ थोर।
मनौं रूप दीपावली, झलमलात चहुँ ओर ll12ll
जेहरि सुमिलि अनुप बनी, नूपुर अनवट चारु।
और छाँड़िकैं या छबिहिं, हिय के नैंन निहारु ll13ll
बिछुवनि की छबि कहा कहौं, उपजत रव रुचि-दैंन।
मनौं सावक कल हंस के बोलत अति मृदु बैंन ll14ll
नख-पल्लव सुठि सोहने, सोभा बढ़ी सुभाय।
मानौं छबि-चंद्रावली, कंज-दलनि लगी आय ll15ll
गौर वरन साँवल चरन, रचि मेहँदी के रंग।
तिन तरुवनि तर लुठत रहैं, रति-जुत कोटि अनंग ll16ll
अति सुकुमारी लाड़िली, प्रिय किशोर सुकुँवार।
इकछत प्रेम छके रहैं, अद्भुत प्रेम विहार ll17ll
अनुपम श्यामल-गौर-छबि, सदा बसहु मम चित्त।
जैसें घन अरु दामिनि, एक संग रहैं नित्तll18ll
वरने दोहा अष्ट-दस, जुगल-ध्यान रस-खानि।
जो चाहत विश्राम ‘ध्रुव’, यह छबि उर में आनि ll19ll
पलकनि कैं जैसैं अधिक, पुतरिन सों अति प्यार।
ऐसैहिं लाडली-लाल के, छिन-छिन चरन सँभार ll20ll